मेरी आरज़ूओं की फेहरिश्त में प्रीत मेरी…
एक तुम्हारा नाम आओ चलें तुमको लेकर
शायद था तो ज़माने से उस नये जहान में
मगर यूँ लगा आज अभी इसी पल
जब तुम आए तराशेंगे हम
जैसे सब कुछ नया है मिलकर उस मकान को
खामोश हो चुके वक्त ने भी उसकी दीवारों पर
मुझसे कहा कुरेदेंगे हर वो इबारत
हाँ ये ही वो आलम है जो रही है आवारा अभी तक
ये ही वो मन्ज़र मिला है आज अन्जाम उसको
जिसके लिए तमाम अरसा इन्तजार ही सही
तुम ताकते रहे उस मोड़ को जो भी था अच्छा था
जहाँ से फूटी ये रोशनी गुज़र गया....
भर लेगी तुम्हें आने वाला कल
अपने आगोश में बेहद ख़ूबसूरत होगा
रौशन कर देगी संग चलोगी जब तुम
ये सफर, ये कारवाँ थाम कर मेरी तकदीर
जो जाता है अपने हाँथों में
दुनिया के उस आखिरी छोर तक दुनिया के उस आखिरी छोर तक।
जहाँ मिलते हैं दोनों जहाँ |
चलोगी ना...?
जहाँ होती है रात
तो जागता है प्यार
खिली धूप में भी
बरसता है प्यार
बहता है चलता है
बस एक, बस प्यार।









