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| Scheveningen beach, The Netherlands September 3, 2012 |
तुम्हारी यादें
डूबते सूरज की
ओट से निकल कर
मेरी उँगलियाँ थाम लेतीं हैं ।
समुन्दर के उस मुझ जैसे
तनहा किनारे की
गर्म रेत पर,
मुझे हाँथों हाँथ थामे
उन मीलों पसरी खामोशियों में
धड़कनों की कदम ताल पे
दूर तक यूँ ही चुपचाप
चलती जाती हैं ।
और फिर अचानक
सूरज डूब जाता है
मुझे एहसास होता है
जैसे अभी किसी ने
मुझे छुआ था
वो एक पल
जो मुझे अरसा सा लगा
उस एक पल में
कुछ तो हुआ था ।
क्या तुम सचमुच आए थे ?
ये उदासी भरे संगीन लमहे
क्या सच में मुस्कुराए थे ?
और मैं वापस लौट पड़ता हूँ
इस उम्मीद में
कि कल फिर दिन होगा
फिर से शाम आएगी
तेरे एहसास से मेरी ऊँगलियाँ
फिर साँस लेंगी ,
और मेरी उदासी भरी तनहा शाम
फिर से मुस्कुराएगी ॥

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