जिस्म सुलगता पानी है
रूह तड़पती साँसें बोझलधड़कन होतीं बेमानी हैं ।
आ भी जाओ ! दिल तनहा है...
पलकें झुकीं लगें बुझतीं सीं
रात अधूरी रह जाए ना
चाँद भी हँस के, प्यार को अपने
झूठा किस्सा कह जाए ना
रुक रुक के आतीं हैं साँसें
ये कैसी नादानी है ।
आ भी जाओ ! दिल तनहा है...
ना जाने किस सोंच में उलझी
किन बातों से डरती हो
यँकीं हमें है खुद से ज्यादा
प्यार मुझी से करती हो ।
फिर क्यों आखिर छुपा रही हो
सच को ऐसे झुठलाओ ना,
खत्म हो चुकीं जो उम्मीदें
उनको जिन्दा कर जाओ ना,
जर्रा-जर्रा मेरा तुझसे
तुझसे मेरी कहानी है ।
आ भी जाओ ! दिल तनहा है...
- August 12, 2006



