रेत के ख़्वाब पुर-ए-जोर बनाते रहिए
आस की तर्ज़ पे नग़मा-ए-ज़िन्दगी गाते रहिए,
किसे मालुम कोई कतरा ख़ुदा के घर को जा पहुँचे
बादलों में बाँध के डोर उड़ाते रहिए॥
आस की तर्ज़ पे नग़मा-ए-ज़िन्दगी गाते रहिए,
किसे मालुम कोई कतरा ख़ुदा के घर को जा पहुँचे
बादलों में बाँध के डोर उड़ाते रहिए
हवा की बात क्या सन्जीदगी वहाँ भी है
चुरा के अश्क हवा भी किसी के लाई है,
दरख़्तों से फिसलते, टूटते, बेज़ार कुछ लमहे
पसीजी नब्ज़ हैं शाखों में इक तनहाई है ।
अश्क हो नूर हों महफिलें यूँही सजाते रहिए,
आस की तर्ज़ पे नग़मा-ए-ज़िन्दगी गाते रहिए,
किसे मालुम कोई कतरा ख़ुदा के घर को जा पहुँचे
बादलों में बाँध के डोर उड़ाते रहिए॥
वो हँसते ज़ख्म तुझको याद कोई ला देंगे
किसे मालुम कोई कतरा ख़ुदा के घर को जा पहुँचे
बादलों में बाँध के डोर उड़ाते रहिए
वो हँसते ज़ख्म तुझको याद कोई ला देंगे
सम्भाला था जिन्हें इक उम्र, तुझे दगा देंगे,
बसा लो कोशिशों की बस्तियाँ, लगा दो लाख पहरे भी,
उस इक काफ़िर की तुझको याद में रुला देंगे ।
ज़हन की आग में फ़लक की बात बनाते रहिए,
आस की तर्ज़ पे नग़मा-ए-ज़िन्दगी गाते रहिए,
किसे मालुम कोई कतरा ख़ुदा के घर को जा पहुँचे
बादलों में बाँध के डोर उड़ाते रहिए॥
किसे मालुम कोई कतरा ख़ुदा के घर को जा पहुँचे
बादलों में बाँध के डोर उड़ाते रहिए

