Sunday, October 13, 2013

तुम हो अदभुत !

तुम हो अदभुत !
कल्पना से परे
की है तुम्हारे नाम मैंने
अपनी ये जिन्दगी,
थी तुम्हारी तलाश
उस अनजान अबूझे पथ पर
जहाँ सूनी राहें थीं
साथी मेरी ।
 
थमती धड़कन
रूकती साँसें ले
ढूँढा तुम्हें पागलों सा
कभी इस मुकाम
कभी उस डगर
हर जलती शाम
हर भीगी सहर,
तुम मिले भी तो
दिल के सारे शब्द
टूट कर बिखर गए

 
  काश !
कि तुम
अनकहे ही समझ पाते
वो तुम्हें पहरों ताकना
तुमसे बातें करना मुस्कुराना
महज़ एक
दिखावा भर नहीं था

दिल की चारदीवारी से घिरा
उम्मीद का वो घरौंदा
तुम्हारा अपना ही था,

कोई
पराया घर नहीं था
मगर अफसोस
लगता है वो बेज़ुबान बातें
  निशब्द ही रह जायेंगी
 और ख़यालों की स्याही से लिखी
वो धुँधली पड़ीं इबारतें
वक्त के सैलाब में
गुमनाम बनकर
यूँ ही कहीं बह जायेंगी ।

1 comment:

Unknown said...

Bahut khubsurat! Motiyon ko pirote jao dost!